Saturday, November 7, 2020

आज हम एक ऐसी सख्सियत के बारे में जाने, जिसने 04 जुलाई 1912 को पराधीन भारत की सरजमीं पर क़दम रखा और दो बर्ष की नासमझ उम्र में प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत से लेकर समापन के दौर को पूरा किया,तब कहीं थोड़ी सी समझ पाई और अपनी माॅ अर्थात् मेरी दादी जी को भी बचपन के बाद जीवन में फिर कभी नहीं देखा। वातों वातों में तो कभी कभी स्वंय को बचपन का मुरहा भी बता देते थे,बचपन के उस कठिन दौर पर यदि कुछ भी कहा जाय,तो यह सूरज को दीपक दिखाने के सिवाय कुछ और नहीं होगा।अपने ऐसे पिता और पूर्वजों को भला कैसे कोई भुला सकता है।

आगे का जो इतिहास है,वह इससे भी गजब और आश्चर्यचकित कर देता है,जब वढती उम्र के इस बालक ने शिक्षा और साधन के अभाव में तांगे के पीछे दौड़ लगा कर प्रारम्भिक और आवश्यक शिक्षा प्राप्त की फिर शिक्षक वने,यह एक दौर था जब बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर जी "शिक्षित वनों, संगठित हो, संघर्ष करो" का मूवमेंट चला रहे थे जिसमें जी जान से कूद पड़े और शिक्षा के इस अभियान से जुड़ गए। इस शिक्षा अभियान में उत्कर्ष योगदान के लिए 29.02.1929 को तत्कालीन डिप्टी इन्स्पेक्टर आफ स्कूल्स एटा ने "प्रिय श्री दुलारे लाल जी" के संवोधन के साथ,सफलता के लिए हार्दिक बधाई दी और यह भी लिख भेजा कि,मेरी तो इच्छा थी कि आप जैसे कार्य कर्ताओं का परिवर्तन में फोटो अवश्य होता किन्तु ऐसा न हो सका"।

वात अभी यहीं खत्म नहीं हुई तत्पश्चात प्रथम भाषा अंग्रेजी, हिंदी व उर्दू के साथ मार्च, सन् 1939 में ग्रह जनपद एटा से वर्नाक्यूलर फाइनल एग्जामिनेशन भी पास कर लिया और कठिनतम व प्रतिकूल स्थिति में कुछ समय बाद मात्र 17.00 (सत्तरह रुपये) मासिक शिक्षक पद से त्यागपत्र दे दिया और फरबरी सन् 1943 में न्यू एटा ड्राइव से जुड़ गए इसके लिए यह प्रमाण पत्र जारी किया गया था "This SANAD is awarded to Dulare Lal of Malawan in appreciation of good work done in connection with the War through the 'New Etah Drive'.

इस प्रकार सन् १९३८ से १९४७ तक देश सेवा में समर्पित रहने के अनेकानेक उदाहरण देखने को मिल जाएंगे,जिसका उल्लेख अपने प्रथम विधानसभा चुनाव के प्रचार में उन्होंने स्वयं किया है।

इसके साथ ही जनरल सेक्रेटरी दलित वर्ग संघ के रूप में सोशल लाइफ की,जिला एटा से शुरुआत की और ता०१९-२-१९४९ को यह माॅग उठाई कि जिन ग्राम पंचायतों में दलितों को चार तक सीटें मिली हैं वहाॅ की अदालती पंचायतों में भी एक सीट अवश्य सुरक्षित कर दी जाय, दलित वर्ग संघ की ओर से यह अपील जिला स्तर से राज्य और केंद्र सरकार तक पहुंचाई गई।

दलित वर्ग संघ एटा का यह कारवां ज़ोर शोर से चल ही रहा था,इसी वीच नंगला कांस,नंगला धारा,नंगला गोवर्धन,बाछमई, चमर नंगला आदि कई गांवों में दलित जातियों पर लूट , खसोट,भाट-बेगार और अमानवीय अत्याचारों की जुल्म ज्याती होने लगी थी और ध्यान भटकाया जाने लगा था। इसी दरम्यान दि०१५-३-१९४९ को मलावन में भी एक बल्वा हुआ औरदि०१-४-१९४९ को उस बल्वे की गूंज प्रेस विज्ञप्ति जारी कर उच्चतम स्तर पर पहुंचाई गई,जिसमें तत्कालीन पुलिस प्रशासन की सूझ बूझ और कर्त्तव्य निष्ठा का उदाहरण मिलता है। यह स्वतंत्र भारत की शुरूआती असाधारण घटनाओं के रूप में भारतीय इतिहास का एक हिस्सा है,जो शासन प्रशासन की तारीफ के लिए उत्कृष्ट जाना गया था। दलित बन्धुओं के लिए उनका उदघोष था कि:-

मिटाओ अपनी हस्ती को,अगर तुम मर्तवा चाहो,

कि दाना मिट्टी में मिलकर,हरा सर सब्ज होता है।

इनके जीवन का यह एक संक्रमण काल था जिसकी गूंज ऊपर तक जोर शोर से उठी और टूण्डला क्षेत्र के तत्कालीन जुझारू नेता श्री उदयवीर सिंह जी के सानिध्य से सन् १९५२ के प्रथम विधानसभा चुनाव में क्षेत्र जलेसर परगना मारहरा विधानसभा क्षेत्र से स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव चिन्ह ऊट  से चुनाव में भागीदारी की। चुनाव प्रचार कविताऐं के रूप में कुछ इस प्रकार था:-। (१)

पड़ी भंवर बिच नाव किसानों,त्यारी और हमारी।

हम किसान और तुम किसान ,हम जानैं व्यथा तुम्हारी।..

(२)

पराधीन यह बैल जुआ में जुते हुए हैं।

केवल अपना पेट भरन को नेता भी अब डटे हुए हैं।।

सन् १९६२ के विधानसभा चुनाव में भारतीय रिपब्लिकन पार्टी ने अपने चुनाव चिन्ह  से पुनः मैदान में उतारा, किन्तु विषम परिस्थितियों में अपनी उम्मीदवारी वापिस लेनी पड़ी। सन् १९६७ में एटा मारहरा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव चिन्ह शेर से चुनाव मैदान में सिरकत की जिसमें श्री मौलाना राहत मौलाई व श्री सादिक नबाज खां आदि का सानिध्य प्राप्त हुआ। इस बार भी कविताओं के बोल कुछ इस प्रकार थे :-

(१)

जय भारत। जय भीम

एटा मारहरा क्षेत्र के मतदाताओं

स्वराज कांग्रेस ने नहीं,देश के हर एक छोटे-बड़े

हमने तुमने सबने लिया

कांग्रेस ने स्वंत्रता की जब थी अंजा लगाई,

अम्बेडकर ने ११कोटि दलितों पर निगाह घुमाई।.....

(२)

सावधान,वोट अमूल्य है

ऊपर भक्क सफेद है भीतर कोयले से भी काले,

गटा पार्चा कागज के यह बैल दिखाने बाले।...........

(३)

शोषितो अपना रखो पराया

मानसिंह गौतम हैं भैय्या बड़े स्वार्थी पक्के,

साथी छेदीलाल है साथी, भीमराव के सच्चे।

बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर जी की रिक्तता में भारतीय रिपब्लिकन पार्टी के विघटन का यह दौर था जो धोखेबाज और दगावाजों से ओत-प्रोत होता चला गया, जिसने समाज को अपूर्णीय छति पहुंचाई। इस छति की भरपाई के लिए परम श्रद्धेय मान्यवर कांशीराम जी ने वामसेफ संगठन खड़ा कर डी.एस.-४ का भारी भरकम भूचाल खड़ा किया जो एटा जनपद की कासगंज तहसील (जो आज एक जनपद है) से बी.एस.पी.के रूप में उदित हुआ। यहां पर भी यह सख्सियत परम श्रद्धेय मान्यवर कांशीराम जी के साथ अपने जीवन भर जुड़ी रही और हम-सब को राजनीति से दूर रहने की प्रेरणा का फरमान जारी किया और दि०09अगस्त 1991 को हमेशा हमेशा के लिए हमसे जुदा हो गए। अपनी जुदाई के बाद जो उन्होंने समाज में छोड़ा उसकी समझ और जानकारी रखने वाले गिने चुने ही लोग होंगे, क्योंकि 108 बर्ष का समय बहुत होता है।

बुरे वक्त में कई पीढ़ी तक निकल जाती हैं। अपने जीवन के कटु अनुभव से राजनीति से दूर रहने की उनकी प्रेरणा आज भी हमारे साथ है। मैं ऐसे महापुरुषों की सामाजिक जिम्मेदारी/कला को आगे बढ़ाने में रुचि रखता हूं जो मुझे या तो विरासत में मिली है अथवा मेरी सेवाओं की रोज मर्रा जरुरत है ।

परम श्रद्धेय पिता श्री दुलारे लाल जी जाटव को उनके जन्म दिवस पर हार्दिक शत् शत् नमन करते है

और तथागत बौद्ध जी से यही प्रार्थना है कि वह समाज को सद्बुद्धि के साथ मार्ग दर्शन कराते रहें,ताकि हमारे पूर्वज बहुजनौं के दिलों पर हमेशा राज करते रहे।

जयभीम नमोबुद्धाय

 


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